حول تشيخوف

"دعونا الكتابة مهزلة في عملين!.. اقناع 1-العمل, وI – 2-ه ... رسوم في النصف " (13, 174).
وSuvorin:
"دعونا الكتابة مأساة “هولوفرنز” على أنغام الأوبرا “جوديث”, الذي سيجبر تقع في الحب مع جوديث هولوفرنز ... المؤامرة هي الكثير. علبة “سليمان” الكتابة, يمكنك أن تأخذ نابليون الثالث ويوجينيا أو نابليون الأول على إلبه " (14, 234).
ومن بضع سنوات:
"اثنان ثلاثة ودعنا نكتب قصة ... أن تبدأ, النهاية أنا » (15, 275).
وحتى مع Goltsev, أستاذ القانون, غير مناسب تماما لالادب، الآداب, وقال انه لا يمانع في الجلوس للكتابة الدراما, "الذي, ربما, وسيكتب, عند hochetsya. أريد أن. فكروا-كا " (16, 110).
وهذه هي رغبة سادة كبيرة للتعاون ودية مع جميع, حتى أصغر الكتاب لديه حقا, كما في أول فرصة انه على استعداد لقبولها لمثل هذا التعاون.
Elisavetinskaya-DeftEx вспоминает:
"بطريقة ما التي انطون لكتابة معي لمدة مسرحية من فصل واحد وكتبت لها مونولوج طويل لأول مرة".
وعندما? AS. تولى Suvorin كان تشيخوف على الاقتراح ووافق على المشارك كتابة الدراما, تشيخوف مع طاقته المعتادة, وهو ما يسمى المتداول في جعبته, على الفور تناولت هذه المسألة بالتفصيل وتطويرها في رسالة طويلة إلى جميع الشخصيات عشرة من اللعب, وليس له خطأ, إذا سقطت حالة على حدة.
وكان يحب السفر في الشركة. في إيران كان يذهب مع ابنه Suvorina, إلى أفريقيا – مكسيم كوفالفسكي, نهر الفولغا – مع Potapenko, في السهوب دونيتسك – مع Pleshcheev.
"ماذا عن رحلة إلى Babkino على بلدي عصابة كاملة من اللصوص قررت إعترف بذلك: للذهاب!» – وكتب اليكسي كيسليوف (14, 43).
"أنا غالبا ما يعتقدون: هل نحن لا جمع شركة كبيرة ولا تذهب في الخارج هل? وسيكون على حد سواء رخيصة والمرح ", – وكتب في Lintvarevyh 1894 عام (16, 171).
للعمل مع الناس ويتجول الناس, ولكن الأهم من ذلك كله أنه يحب أن يكون متعة مع الناس, تتصرف بشكل شنيع, أن تضحك معهم،. "ذهبنا إلى باحة الكلية, إلى جده, عربة مريحة جدا, – يكتب Pleshcheyev من سومي في أواخر الثمانينات. – يضحك, مغامرات, سوء الفهم, توقف, وكانت الاجتماعات على الطريق الكثير الكثير ... أوه, لو كنت معنا ومراجعة غاضب حوذي الرومانية, التي كان من المستحيل أن ننظر دون يضحك ... وأكلوا وشربوا كل نصف ساعة ... ضحك على المغص ... بعد قلب, ارتفع اجتماع بهيجة الضحك الوحشي العام, والضحك وتكررت بعد ذلك بعناية كل ليلة " (14, 128-129).
وكان الضحك من غير المعقول, لأنه لم يكن عقله تشيخوف.

هذا الشاب, immortally صدر الضحك البهجة تشيخوف كما, أن, قريبا كما كان بين صدر عمله الشاق مدة ساعة على الأقل من الراحة, المرح وفاز بها منه, وكان من المستحيل عدم الضحك معه. ثم بالإضافة إلى بخارى رداء, vymazhet وجهه مع السخام, وقالت انها ترتدي عمامة والتظاهر "البدو", المدعي العام نفسه zagrimiruet, يرتدي زي المطرزة بالذهب رائع, الانتماء إلى صاحب البيوت, ويقول لائحة الاتهام ضد صديقه يفيتان, خطاب, которая, وفقا لشقيقه, "جميع اضطر ليموت من الضحك". اتهم تشيخوف ويفيتان من التهرب من التجنيد, وتقطير سرا, وفي الحفاظ على قروض سلفة نقدية سرية، ودعت إلى هذا المقعد الحكم هزلية آخر من صديقه, مهندس Shechtel, كطرف مدني.
موسكو شرطي وضعه في أيدي البطيخ الثقيل, ملفوفة في ورقة سميكة, وأقول له مع عملي نظرة قلق،: «قنبلة!.. جلب إلى محطة, نعم نرى الحذر ", – أو إقناع الكاتب الشاب الساذج إلى القداسة, الحمام له مع لون الريش القهوة تأتي من كرة عرضية بين حمامة مع القط, الذين يعيشون في نفس الفناء, كما معطف في هذا القط هو نفس اللون, أو الفتوة زوجته لفستان مايكل والكتابة لها شهادة طبية, انها "التكلم البطني المرضى", – هذا مؤذ ويوجه دائما.
وحطم رأسه في حالة سكر الشاعر. وصل المنتخب التشيكي لعلاج له، وأخذ معه الكاتب الشاب. "من هو معك?» – "الإسعاف". – "أعطه لمشكلته?» – واضاف "بالتأكيد". – "كم?» – "ثلاثون Kopeek".
والكاتب الشاب سلم بامتنان ثلاثة سنتات،.
في هذه الجاذبية الأطفال بحتة لجميع أنواع الخدع مؤذ, harlequinade, كانت مرتجلة تشيخوف مشابهة جدا لتلك التي نورس آخر كبير الرأس وzhiznelyubtsa – ديكنز.
جاء تشيخوف مرة واحدة مع الفنان Svobodin والشركة من أصدقاء آخرين في بلدة صغيرة اكتيركا. البقاء في فندق. Svobodyn, الممثل شخصية الموهوبين, بدأت تلعب الرسم البياني مهم, مما اضطر الفندق بأكمله ترتعش, وأخذ تشيخوف حول دور العميلة له، وخلق مثل هذه الصورة الفنية إقناع الكونت مدلل غابة العميلة, الناس, الذين شهدوا هذه اللعبة, وأربعين عاما, تذكر لها, لا يمكن أن تساعد ولكن smeha1.
أو يذهب للتدريب مع والدته, شقيقة وعازف التشيلو سيماشكو. في السيارة معهم شعبية موسكو شكسبير Storozhenko. منذ شقيقة تشيخوف كان حتى وقت قريب الطالبات, انها في رهبة من أستاذه المفضل. "ماشا, – وقال في رسالة إلى تشيخوف, – في كل وسيلة تظاهرت, ما هو غير مألوف بالنسبة لي وسيماشكو ... لمعاقبة مثل هذه التفاهة, تحدثت بصوت عال حول, عملت طباخا في الكونتيسة كيلر والذي كان لي السادة جيدة; قبل الشرب, في كل مرة كنت انحنى إلى والدتها وتريد أن تجد بسرعة مكانا جيدا في موسكو (عبيد. – K.Ç.). صورت سيماشكو خادم " (14, 394).
هذه الإرتجال تشيخوف وغيرهم من المعنيين. عندما جاء إلى الحاضر الصيد طبيب الأسنان, وضع شقيقه مايكل على ثوب المرأة, تحولت إلى خادمة جميلة, يفتح الأبواب أمام المرضى, وكذلك المرضى الذين كانوا خمسة أو ستة من سكان اابك. حتى ذلك الحين، وهؤلاء الناس, يجب ان يكون, انهم لا يعرفون ميول فنية, لكن تشيخوف المصابين منهم مع إبداعه ارتجالي, وانضموا طواعية لعبة. عندما بين مرضاه زار شقيقه الكسندر, التشيك برزت في فمه الهائل ملقط الفحم, وبدأت "عملية جراحية", حيث عندما, ووفقا Sergeenko, مهدور الحالي مع الضحك. "ولكن هذا مجرد التاج. انتصارات العلم. تسحب انطون طافوا زميله الفم جيدة “المريض” الأسنان سيئة ضخمة (فلين) ويظهر ذلك للجمهور ".
لذلك ترى أنه في هذا الوقت: высокий, أنيق, مرن, المحمول جدا, بعيون مرح البني الفاتح, مما أدى إلى كل ما قدمه مغناطيسيا.
في المباريات، وقال انه لا يرغب في ان يكون عازف منفرد. كل من تعهده تمت يرتديها دائما, إذا جاز التعبير, شخصية مؤنس:
"لقد بنينا أنفسهم الروليت ... دخل الروليت هو سبب شائع – نزهات. أنا موظف نادى القمار " (15, 208).
"كان لي حفل تنكري".
1 M. ص. التشيك. حول تشيخوف. الاجتماعات والانطباعات. M” 1960.

«Затеваем на праздниках олимпийские игры в нашем дворе и, على فكرة, хотим играть в бабки» (14, 91-92).
Даже усталых и старых приобщал он к своей неугомонной веселости. Долго не мог опомниться старик Григорович, нечаянно попавший в самый разгар кутерьмы, которую вместе со своими гостями устроил Чехов у себя на московской квартире. В эту молодую кутерьму в конце концов втянулся и он, автор «Антона Горемыки», седой патриарх, а потом вспоминал о ней с комическим ужасом, воздевая руки к небесам:
«Если бы вы только знали, что там у Чеховых происходило! Вакханалия… настоящая вакханалия!»1
А его ранние письма к родным и друзьям… Читая их, смеешься даже неудачным остротам, ибо они так и пышут веселостью. Возвращает он, مثلا, приятелю взятый у того на время сюртук:
«Желаю, чтобы он у тебя женился и народил множество маленьких сюртучков» (13, 87).
Какой-то пасквилянт написал стишки, где назвал его ветеринарным врачом, «хотя, – сообщает Чехов, – я никогда не имел чести лечить автора» (13, 379).
و, как это часто бывает в счастливых, молодых, сплоченных семьях, в полковых и школьных коллективах, التشيك, разговаривая с близкими, заменял обычные их имена фамильярными кличками. Многие из этих причудливых кличек прилипали к людям на всю жизнь, но он неистощимо придумывал новые, и нередко данное им прозвище оказывалось гораздо точнее, чем то случайное имя, которое у человека было в паспорте.
Лику Мизинову он звал Канталупа, брата своего АлександраФилинюга, детородный чиновник; брата НиколаяМордокривенко, а всего чащеКосой или Кокоша, а какую-то девицуСамрварочка.
Иван Щеглов был у него герцог Альба, или Жан, или милая Жанушка; Борис СуворинБарбарис; Сережа Киселев, гимназист, назывался попеременно то Грипп, то Коклюш.
Музыкант Мариан Ромуальдович был превращен им в Мармелада Фортепьяновича.
1 M. ص. Ч е х о в. حول تشيخوف.
Себя самого Чехов величал в своих письмах то Гунияди Янос, то Достойнов-Благонравов, то Бокль, то граф Черномор-дик, то Повсекакий, то Аркадий Тарантулов, то Дон Антонио, то академик Тото, то Шиллер Шекспирович Гете.
Клички раздавались родным и приятелям, إذا جاز التعبير, на основе взаимности. و, مثلا, его брат Александр, بدوره،, называл его Гейним, Стамеска, Тридцать Три моментально. Для Щеглова он был Антуан и Потемкин, для Яворскойадмирал Авелан.
Здесь дело не столько в кличках, сколько в той «вакханалии» веселости, которая их порождала.
И в тогдашних писаниях Чехова та же вакханалия веселости. «Из меня водевильные сюжеты прут, как нефть из бакинских недр!» – восклицал Антон Павлович в конце восьмидесятых годов (14, 259).
Изобилие кипящих в нем творческих сил поражало всякого, с кем он в то время встречался. «Образы теснились к нему веселой и легкой гурьбой», – вспоминал Владимир Короленко1. «Казалось, из глаз его струится неисчерпаемый источник остроумия и непосредственного веселья»2.
«- Знаете, как я пишу свои маленькие рассказы? – спросил он у Короленко, когда тот только что познакомился с ним. – Вот.
Он оглянул стол, взял в руки первую попавшуюся на глаза вещьэто оказалась пепельница, – поставил ее передо мною и сказал:
Хотитезавтра будет рассказ… ЗаглавиеПепельница»3.
И Короленко показалось, что над пепельницей «начинают уже роиться какие-то неопределенные образы, положения, приключения, еще не нашедшие своих форм», но уже оживленные юмором.
Всех изумляла тогда именно эта свобода и легкость, с которой бьющая в нем через край могучая энергия творчества воплощалась в несметное множество бесконечно разнообраз 1А.П. Чехов в воспоминаниях современников. M., 1960.
2Там же.
3Там же. ных рассказов. С самой ранней юности, лет десятьдвенадцать подряд, Чехов работал, как фабрика, не зная ни минуты простоя, выбрасывая горы продукции, و, хотя среди этой продукции на первых порах попадалось и некоторое количество брака, в скором времени Чехов, нисколько не снижая своих темпов, стал выпускать, как будто по конвейеру, бесперебойно, واحدا تلو الآخر, целые десятки шедевров, написанных с такой виртуозностью, что иному даже крупному таланту, например Василию Слепцову, понадобилось бы на каждый из них никак не меньше полугода работы. А он создавал их без натуги, чуть ли не ежедневно, واحدا تلو الآخر: и «Орден», и «Хирургию», и «Канитель», и «Лошадиную фамилию», и «Дочь Альбиона», и «Шило в мешке», и «Живую хронологию», и «Аптекаршу», и «Женское счастье», и мириады других, и в каждом из них уже восьмое десятилетие живет его неумолкающий хохот.
«Чехова, тоже приложение, прочитал две книжки, хохотал как черт, – писал Максиму Горькому какой-то крестьянин. – Матери с женой читал то же самое, разливаютсяхохочут. Воти смешно, а мило
Это было очень давно. А уже в наше время в Москве студентки первого курса медвуза, собираясь на ночное дежурство, взяли у меня какой-то чеховский том и всю ночь прохохотали до икоты. «Дежурство кончилось, пора расходиться, а мы все еще читаем и смеемся как дуры».
Через столько мировых катастроф, через три войны, через три революции прошла эта юмористика Чехова. Сколько царств рушилось вокруг, сколько отгремело знаменитых имен, сколько позабыто прославленных книг, сколько сменилось литературных течений и мод, а эти чеховские однодневки как ни в чем не бывало живут и живут до сих пор, и наши внуки так же хохочут над ними, как хохотали деды и отцы. بالطبع, критики долго глядели на эти рассказы с высокомерным презрением. Но то, что они считали безделками, оказалось нержавеющей сталью. اتضح أنه, что каждый рассказ есть и в самом деле стальная конструкция, которая так самобытна, изящна, легка и прочна, что даже легионам подражателей, пытавшимся в течение полувека шаблонизировать каждый эпитет, каждую интонацию Чехова, так и не удалось до сих пор нанести этим творениям хоть малейший ущерб. Уже восемьдесят лет зара зительный чеховский смех звучит так же счастливо и молодо, как звучал он в Бабкине, на Якиманке, в Сорочинцах, на Садо-во-Кудринской, на Луке.
III
Когда же этот счастливейший из русских великих талантов, заразивший своей бессмертной веселостью не только современников, но и миллионы еще не рожденных потомков, заплакал от гневной тоски, вызванной в нем «проклятой расейс-кой действительностью», – он и здесь обнаружил свою могучую власть над людьми.
Даже молодой Максим Горький, совершенно несклонный в те годы к слезам, и тот поддался этой власти. Вскоре после появления в печати чеховского рассказа «В овраге» Горький сообщил Чехову из Полтавской губернии:
«Читал я мужикамВ овраге”. Если бы вы видели, как это хорошо вышло! Заплакали хохлы, и я заплакал с ними»1.
Это свое соучастие в чеховском плаче Горький отмечал тогда не раз.
«Сколько дивных минут прожил я над Вашими книгами, сколько раз плакал над ними», – писал он Чехову еще в первом письме2.
И снова через несколько лет:
«На днях смотрелДядю Ваню”, смотрел иплакал, как баба, хотя я человек далеко не нервный»3.
Горький любил «Дядю Ваню», ходил смотреть его несколько раз и после тридцать девятого его представления сообщил Чехову в письме из Нижнего Новгорода:
«И плакала публика и актеры»4.
Таково было могущество чеховской скорби: даже профессионалы актеры после полусотни репетиций, после тридцати девяти представлений, когда пьеса давно уже стала для них
1M. Го р ь к и й и А. Ч е х о в. Переписка, статьи, высказывания. M., 1951.
(Курсив мой. – K.Ç.)
2Там же. (Курсив мой. – K.Ç.)
3Там же. (Курсив мой. – K.Ç.)
4Там же. (Курсив мой. – K.Ç.) ежедневной привычкой, вместе со зрителями не могут удержаться от слез!
И как любили тогдашние люди покоряться этой чеховской тоске! Какой она казалась им прекрасной, облагораживающей, поэтичной, возвышенной! والأهم من ذلك (повторяю) – какая проявилась в ней необыкновенная сила: не было в литературе всего человечества другого такого поэта, который без всякого нагромождения ужасов, при помощи одной только тихой и сдержанной лирики мог исторгать у людей столько слез!
Ибо то, что многиеглавным образом реакционныекритики предпочитали считать мягкой, элегической жалобой, на самом деле было грозным проклятием всему бездушному и бездарному строю, создавшему Цыбукиных, Ионычей, унтеров Пришибеевых, «человеков в футляре» и др.
باختصار, в грусти он оказался так же могуч, как и в радости! И там и здесь, на этих двух полюсах человеческих чувств, у него равно великая власть над сердцами.
Но и в грусти и в радости до последнего вздоха оставалось при нем его художественное восхищение миром, которое в виде чудесной награды смолоду дается великим поэтам и не покидает их в самые черные дни.
Сколько мудрейших безуспешно пытались «жизнь полюбить больше, чем смысл ее», – полюбить прежде логики и даже наперекор всякой логике, как упорно тщились они убедить и себя и других, что «пусть они не верят в порядок вещей, но дороги им клейкие, распускающиеся весной листочки», это оставалось одной декларацией и почти никогда не осуществлялось на деле, потому что все клейкие листочки всех на свете лесов и садов не могли заслонить от них мучительного «порядка вещей». А Чехову не нужно было ни малейших усилий, чтобы в те минуты, когда мучительный порядок вещей переставал хоть на миг тяготить его ум, «нутром и чревом» отдаваться очарованиям жизни, и оттого-то в его книгах и письмах так много благодарности миру за то, что этот мир существует.
Превозмогая обожанье, Я наблюдал, боготворя…
«Так, знаешь, весело было глядеть в окно на темневшие деревья, на речку…» (13, 135), «То есть душу можно отдать не чистому за удовольствие поглядеть на теплое вечернее небо, на речки и лужицы…» (14,129), «Роскошь природа! Так бы взял и съел ее!» (13, 134).
И он накидывался на нее, как обжора на лакомство. Она казалась ему восхитительно вкусной. Не осталось в России таких облаков, закатов, тропинок, березок, лунных и безлунных ночей, мартовских, августовских, январских пейзажей, которыми не лакомился бы он с ненасытной жадностью; и характерно, что в чеховских письмах гораздо больше говорится о природе, من, مثلا, в письмах таких общепризнанных поэтов природы, как Тютчев, Майков, تورجنيف, Полонский и Фет. Природа для него всегда событие, و, говоря о ней, هذا, столь богатый словами, чаще всего находил всего лишь один эпитет: изумительная.
«Днем валит снег, а ночью во всю ивановскую светит луна, роскошная изумительная луна. Великолепно» (15, 443).
«В природе происходит нечто изумительное, трогательное, что окупает своей поэзией и новизною все неудобства жизни. Каждый день сюрпризы один лучше другого. Прилетели скворцы, везде журчит вода, на проталинах уже зеленеет трава» (15, 344).
«Погода здесь изумительная, удивительная. Такая прелесть, что и выразить не могу…» (17, 238).
Как возлюбленная для влюбленного, природа была для него каждую минуту нова и чудесна, и все его письма, где он говорит о природе, غير, في الواقع, любовные письма.
«Погода чудесная. Все поет, цветет, блещет красотой. Сад уже совсем зеленый, даже дубы распустились… Каждый день родятся миллиарды существ» (14, 355).
Огромна во всех его письмах эта интенсивность восхищения природой:
«Природа удивительна до бешенства и отчаяния… Подлец я за то, что не умею рисовать…» (14, 140).
«Погода изумительна. Цветут розы и астры, летят журавли, кричат перелетные щеглы и дрозды. Один восторг» (16,361).
«Две трети дороги пришлось ехать лесом, под луной, и самочувствие у меня было удивительное, какого давно уже не было, точно я возвращался со свидания» (16, 146).

«نعم, в деревне теперь хорошо. Не только хорошо, но даже изумительно… У меня ни гроша, но я рассуждаю так: богат не тот, у кого много денег, а тот, кто имеет средства жить теперь в роскошной обстановке, какую дает ранняя весна» (15, 375).
И как темпераментно гневался он на природу, когда она оказывалась не такой изумительной, как этого хотелось ему:
«Погода сволочная… Дорога прескучнейшая, можно околеть от тоски» (13, 226), «Небо глупо, как пробка…» (13, 211).
Вообще связь его с природой была так неразрывна, что он в своих письмах либо проклинал ее, либо радовался ей до восторга, но никогда не чувствовал равнодушия к ней.
Равнодушие вообще было чуждо ему, иначе он не был бы великим художником, и когда однажды, в начале девяностых годов, на короткое время нашла на него полоса равнодушия, даже не равнодушия, а житейской усталости, он почувствовал к себе самому отвращение, словно он болен постыдной болезнью. Так омерзительно было ему равнодушие. Ибо его главное, основное, всегдашнее чувствожадный аппетит к бытию, любопытство к осязаемому, конкретному миру, ко всем его делам и явлениям. С полным правом он мог бы сказать о себе то, что говорит у него один из самых грустных его персонажей:
«Я готов был обнять и вместить в свою короткую жизнь все, доступное человеку. Мне хотелось и говорить, и читать, и стучать молотом где-нибудь в большом заводе, и стоять на вахте, и пахать. Меня тянуло и на Невский, في هذا المجال, и в море – في كل مكان, куда хватало мое воображение» (8, 218).
Это не беллетристика, а подлинное чеховское чувство, присущее ему во все времена. «И в самом деле мне теперь так сильно хочется всякой всячины, – وكتب, مثلا, Суворину в 1894 عام, – как будто наступили заговены. Так бы, يبدو, все съел: и заграницу, и хороший роман… И какая-то сила, точно предчувствие, торопит, чтобы я спешил…» (16, 155-156). «Мне хочется жить, и куда-то тянет меня какая-то сила. Надо бы в Испанию и в Африку» (16, 152).
بعد, في 1900 عام, уже скованный смертельной болезнью, он говорил молодому писателю:
«Я бы на Вашем месте в Индию укатил, черт знает куда, я бы еще два факультета прошел» (18, 324).
И как горячо возразил он на угрюмую толстовскую притчу «Много ли человеку земли нужно?», где доказывалось, что человеку, хотя он и мечтает о захвате необъятных пространств, нужны только те три аршина, которые будут отведены для его погребения.
«Но ведь три аршина нужны трупу, а не человеку…писал он вКрыжовнике”. – Человеку нужно не три аршина земли, не усадьба, а весь земной шар, вся природа, где на просторе он мог бы проявить свои свойства и особенности своего свободного духа» (9, 269).
Ибо «солнце не восходит два раза в день, и жизнь дается не дважды» (8, 226).
Как издевался он над теми писателями, أن, домосед-ствуя в четырех стенах, наблюдают жизнь с одного лишь Тучкова моста: лежат себе на диване, в номере, а в соседнем номере направо какая-то немка жарит на керосинке котлеты, а налеводевки стучат бутылками пива по столу. И в конце концов писатель начинает смотреть на все «с точки зрения меблированных комнат» и пишет уже «только о немке, о девках, о грязных салфетках» (7, 501).
Сам Чехов уже к тридцатилетнему возрасту побывал и во Владивостоке, и в Гонконге, и на Цейлоне, и в Сингапуре, и в Индии, и в Архипелаге, и в Стамбуле и еще не успел отдохнуть после этой поездки, как уже отправился в Вену, в Венецию, в Рим, в Неаполь, в Монте-Карло, в Париж.
«Ахнуть не успел, как уже невидимая сила опять влечет меня в таинственную даль» (15, 169).
Стоило ему просидеть хоть полгода на месте, и письма его наполнялись мечтами о новой дороге.
«Душа моя просится вширь и ввысь..» (15, 391).
«Мне ужасно, ужасно хочется парохода и вообще воли» (15, 386).
«Кажется, что если я в этом году не понюхаю палубы, то возненавижу свою усадьбу» (15, 390).
И при этом тысячи планов:
«У меня был Л[ев] L[ьвович] Толстой, и мы сговорились ехать вместе в Америку» (16, 17).
«Все жду Ковалевского, поедем вместе в Африку» (17, 189).

«Поехал бы и на Принцевы острова, и в Константинополь, и опять в Индию, и на Сахалин» (15, 385-386).
«Я бы с удовольствием двинул теперь к Северному полюсу, куда-нибудь на Новую Землю, на Шпицберген» (19, 259).
Со свойственной ему энергичной экспрессией описывал он те наслаждения, которые дает ему скитальчество:
«Проплыл я по Амуру больше тысячи верст и видел миллионы пейзажей… Право, столько видел богатства и столько получил наслаждений, что и помереть теперь не страшно» (15, 120-121).
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